रविवार, 20 मार्च 2016

एक दोस्त जा रहा है...

मैं तुम्हारी बुराई करता हूँ
हाँ मैं बुरा हूँ
मैं तुम्हारी हर अच्छी बात की निंदा करता हूँ
मैं फिक्र करता हूँ...
ज़िक्र नहीं, ज़िक्र तुम्हें महसूस होता है
तुम अलग होना चाहते हो, क्योंकि मैं बुराई करता हूँ
मेरी बातें चुभती है क्योंकि मैं तुम्हें तुम्हारा सपना चुभाता हूँ
तुम्हें कुछ और पसंद है...
मैं तुम्हारी बुराई करता हूँ
मैं तुम्हारी हर अच्छी बात की बुराई करता हूँ
ताकि तुम और अच्छी बात कर सको...
मैं फांस हूँ जो तुम्हें रास नहीं
मैं आवाज़ हूँ कोई तुम्हारी सांस नहीं
वो तो तुम ले रहे हो... जी रहे हो...
एक अड़चन हूँ जो चढ़ने में तकलीफ लगती है
मगर पैर रखने का ज़रिया होती है
मैं पैर सहता हूँ तुम्हारा, निंदक हूँ तुम्हारे चढ़ने के तरीकों का
ताकि तुम ठीक से चढ़ सको
तुम जान सको खुद को...इसलिए हम साथ है
मैं मान सकूँ खुद को... इसलिए हम साथ है
तुम याद दिलाते हो मुझे व्यक्तित्व मेरा
मेरी पहचान कराते हो ज़माने से
सच दिखाते हो एक आईने से...
क्षण में याद दिलाते हो कि मैं क्यों हूँ यहाँ
तुम अब अलग हो रहे हो...
खुद ही से शायद कहीं
दोस्त हो तुम...
यही तसल्ली रहेगी कहीं...

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