गुरुवार, 24 मार्च 2016

Sab Ki Sarkari...Desh Ki Tarkari

एक सरकारी दफ्तर में घंटों बैठे बिता देना, ये आम आदमी से बहतर कोई नहीं समझ सकता।अगर आप आम आदमी है तो, केबिन के अंदर की खुसुर- पुसुर आपकी हताशा को बढ़ाती जाती है। वास्तव में इंसान काम करने में इतना नही थकता जितना की सरकारी दफ्तर में बैठ कर अपने नंबर का इंतज़ार करने में थकता है। उसके लिए सरकारी अफसरों के दस्तख़त तो जनाब एसे हो जाते है जैसे कागज़ पर भगवान उतरे देखता हो। एक दस्तख़त के लिए दस्तक देते देते वो वहीं उन सरकार के नौकरों के सामने अपने समय के साथ कारोबार करता, थकता जाता है। केबिन में टंगे कैलेन्डर पंखे और एसी की हवा के साथ लहरे मारते हुए उसका मज़ाक उड़ाते है, वो अफसरों के सामने एक तारीखों की फहरिस्त बांध देते है कि साहब जब चाहे इसे बुलालो... ना बुला पाओ तो फिर "कल" तो है ही और अगर आज शुक्रवार है तो परसों के बाद भी आप उसे बुला सकते हो। कुर्सियों पर चढ़ा रिश्वत का गद्दा बड़े अभिमान के साथ उसे देख कर हँसता रहता है। नीचे खड़ी एंबेसेडर गाड़ियाँ साहबों को बुलाती रहती है ताकि वो अपने चपरासियों को ये बोलने का मौका दे सके कि साहब तो "राउड" पर गए है। और फिर से बात कल पर फिदा हो जाए। आदमी इंतज़ार में ज्यादा थकता है और घड़ी से बाते करते हुए मन के कोतूहल को समझाता है।
चपरासी कि मुस्कुराहट उसे चाय पानी देने का इशारा करती है और ये भी बतला देती है कि अंदर एक बड़ा राक्षस भी डकार लेने के लिए बैठा है। अफसरों के मुँह से ये सुनना शोभा तो नहीं देता कि " देखिये मैं तो सरकार का सेवक हूँ, सरकार की नौकरी करता हूँ" पर फिर भी प्राय: कुछ मोटी तोंद के अफसर इस वाक्य का प्रयोग अपना रौब और चाटुकारिता दिखाने में करते है तब अाम आदमी का गुस्सा उनके इस पीजे को सुन कर और ज्यादा बढ़ जाता है। बात आगे बढ़ते ही अफसर समझाते हुए कहता है कि " देखिए ये एक सिस्टम है, इट्स अ गवरमेंट प्रोसेस... टाईम तो लगता है" और उनके इस वाक्य के ख़त्म होते ही आदमी का धक धक करता कलेजा, टेबल के नीचे से या मुठ्ठी में भींचे से, कितना, कैसे, कब और क्यों देना है, की शंका में झूलते हुए पूछ लेता है और धीरे से अपने आप ही अफसर के होठों और आम आदमी के कानों का मिलन होता है और कुर्सी पर चढ़ा रिश्वत का गद्दा उस राक्षस रूपी अफसर से कहलवाता है "आपका काम हो जाएगा... पर आप "" कल"" आना...अभी बड़े साहब के साइन बाकी है... वो आज छुट्टी पर है"
कॉलेज के दिनों में मेरे ज्यादातर दोस्त सरकारी नौकरी के लिए मरते थे और अब समझ आया कि सरकारी नौकरी भविष्य सुरक्षित करने के लिए नहीं चुनी जाती है,बल्कि भविष्य सुविधा जनक बनाने के लिए चुनी जाती है|
#bribeZindabad
#aamAdmimurdabaad
#kal_parso

रविवार, 20 मार्च 2016

एक दोस्त जा रहा है...

मैं तुम्हारी बुराई करता हूँ
हाँ मैं बुरा हूँ
मैं तुम्हारी हर अच्छी बात की निंदा करता हूँ
मैं फिक्र करता हूँ...
ज़िक्र नहीं, ज़िक्र तुम्हें महसूस होता है
तुम अलग होना चाहते हो, क्योंकि मैं बुराई करता हूँ
मेरी बातें चुभती है क्योंकि मैं तुम्हें तुम्हारा सपना चुभाता हूँ
तुम्हें कुछ और पसंद है...
मैं तुम्हारी बुराई करता हूँ
मैं तुम्हारी हर अच्छी बात की बुराई करता हूँ
ताकि तुम और अच्छी बात कर सको...
मैं फांस हूँ जो तुम्हें रास नहीं
मैं आवाज़ हूँ कोई तुम्हारी सांस नहीं
वो तो तुम ले रहे हो... जी रहे हो...
एक अड़चन हूँ जो चढ़ने में तकलीफ लगती है
मगर पैर रखने का ज़रिया होती है
मैं पैर सहता हूँ तुम्हारा, निंदक हूँ तुम्हारे चढ़ने के तरीकों का
ताकि तुम ठीक से चढ़ सको
तुम जान सको खुद को...इसलिए हम साथ है
मैं मान सकूँ खुद को... इसलिए हम साथ है
तुम याद दिलाते हो मुझे व्यक्तित्व मेरा
मेरी पहचान कराते हो ज़माने से
सच दिखाते हो एक आईने से...
क्षण में याद दिलाते हो कि मैं क्यों हूँ यहाँ
तुम अब अलग हो रहे हो...
खुद ही से शायद कहीं
दोस्त हो तुम...
यही तसल्ली रहेगी कहीं...